दिल्ली में छात्रों का महाआंदोलन: पेपर लीक के खिलाफ सड़क से पीएम आवास तक संग्राम, क्या यह लोकतंत्र का 'काला दिन' है? ||Massive student movement in Delhi: Struggle from streets to PM's residence against paper leak, is this a 'black day' for democracy?
दिनांक: 21 जुलाई 2026
लेखक: उमेश तिवारी
कैटेगरी: राष्ट्रीय / विशेष खोजी रिपोर्ट / युवा आवाज़
देश की राजधानी दिल्ली इस समय एक अभूतपूर्व और स्वतः स्फूर्त (Spontaneous) छात्र आंदोलन की गवाह बन रही है, जिसने देश के सबसे शक्तिशाली सत्ता गलियारों को हिलाकर रख दिया है। 20 और 21 जुलाई 2026 को नीट (NEET), रीटी (REET), एसएससी जीडी (SSC GD) और यूपीएसआई (UPSI) जैसी देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार हो रहे [बोल्ड करें: पेपर लीक और संस्थागत भ्रष्टाचार] के खिलाफ लाखों युवाओं ने दिल्ली की सड़कों पर उतरकर "चलो संसद" मार्च का आह्वान किया।
वर्षों तक कमरों में बंद रहकर अपना खून-पसीना बहाने वाले इन होनहार नौजवानों का जब व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ गया, तो वे सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए। लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ यह आंदोलन कुछ ही घंटों में एक भयानक प्रशासनिक क्रैकडाउन, आंसू गैस के गुबार, लाठीचार्ज और सड़क से लेकर संसद व पीएम आवास तक के तीखे राजनीतिक महासंग्राम में तब्दील हो गया।
1. ग्राउंड जीरो की खौफनाक हकीकत: लाठियां, आंसू गैस और करंट के संगीन आरोप
20 जुलाई की सुबह होते-होते नई दिल्ली का पूरा इलाका किसी छावनी में तब्दील हो चुका था। दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने जंतर-मंतर और संसद मार्ग की तरफ आने वाले रास्तों पर बहु-स्तरीय (Multi-layered) 7-8 फीट ऊंची लोहे की बैरिकेडिंग कर रखी थी। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के नाम पर प्रशासन ने मेटल डिटेक्टर और सुरक्षा द्वारों को हटा दिया था। पूरे नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) लागू करके 5 से अधिक लोगों के जुटने पर पाबंदी लगा दी गई थी और छात्रों के इस 'संसद मार्च' की आधिकारिक अनुमति को खारिज कर दिया गया था।
जैसे ही सुबह करीब 9:00 बजे भीड़ अचानक बढ़ी और प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को पार कर संसद की तरफ बढ़ने की कोशिश की, सुरक्षा बलों ने बल प्रयोग शुरू कर दिया। ग्राउंड जीरो पर मौजूद अलग-अलग राज्यों (जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, अलीगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र) से आए छात्रों और स्वतंत्र पत्रकारों की लाइव रिपोर्ट्स ने प्रशासन की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं:
बिना नेमप्लेट वाले पुलिसकर्मी और सादी वर्दी का कहर: प्रदर्शनकारी छात्रों ने लाइव कैमरों पर रोते हुए आरोप लगाया कि ड्यूटी पर तैनात कई पुलिस अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों ने जानबूझकर अपनी वर्दी से नेमप्लेट और बैच नंबर हटा रखे थे। इसके अलावा, सादे कपड़ों (सिविल ड्रेस) में आए अज्ञात लोगों ने भी छात्रों पर बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिसे छात्रों ने लोकतंत्र का खुला हनन बताया।
बैरिकेड्स में करंट छोड़ने का खौफनाक दावा: संसद मार्ग और कनॉट प्लेस के पास मौजूद कई प्रदर्शनकारियों ने कैमरे पर यह गंभीर आरोप लगाया कि भीड़ को पीछे धकेलने के लिए पुलिस ने लोहे के बैरिकेड्स में बिजली का करंट छोड़ रखा था, जिससे आगे खड़े छात्रों को तेज झटके लगे।
आंसू गैस का मानवीय संकट और पैनिक अटैक: ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों ने खुद महसूस किया कि पूरे इलाके में दागे गए आंसू गैस के तीखे गोलों की वजह से वहां मौजूद हर व्यक्ति को सांस लेने में भारी कठिनाई और आंखों-चेहरे पर असहनीय जलन का सामना करना पड़ा। इस भगदड़ और लाठीचार्ज में स्कूली बच्चे, युवा और बुजुर्ग भी शामिल थे, जिनमें से कई गंभीर रूप से चोटिल हो गए और कुछ लोग अत्यधिक मानसिक दबाव के कारण पैनिक अटैक (Panic Attack) का शिकार हो गए।
आंदोलन को बदनाम करने की कथित साजिश: सीजेपी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने जंतर-मंतर के पास पत्थरों से भरे एक क्षतिग्रस्त पुराने ट्रक की मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए एक वीडियो जारी किया। उन्होंने आशंका जताई कि पुलिस ने इस वाहन को जानबूझकर वहां खड़ा किया था ताकि कोई अप्रिय घटना या पथराव का झूठा आरोप लगाकर इस शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम किया जा सके और छात्रों को हिंसक घोषित किया जा सके।
छात्राओं का साहस और मानव श्रृंखला: इस प्रदर्शन में बहुत बड़ी संख्या में देश की बेटियां और छात्राएं शामिल थीं। जब पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू किया और पीछे हटने का कोई रास्ता (Open space) नहीं बचा, तो छात्रों ने खुद से एक 'ह्यूमन चेन' (मानव श्रृंखला) बनाकर महिला प्रदर्शनकारियों को सुरक्षित मार्ग देने का प्रयास किया।
2. संसद का मानसून सत्र: सड़क की गूंज से पहले ही दिन थर्राया सदन
सड़कों पर मचे इस कोहराम की गूंज 21 जुलाई को शुरू हुए संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन भीतर तक पहुंच गई। हालांकि सत्र की शुरुआत से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया के सामने आकर सभी राजनीतिक दलों से सदन के भीतर रचनात्मक, सकारात्मक और तथ्यों पर आधारित चर्चा करने की अपील की थी और सरकार का मुख्य एजेंडा MSMEs को बढ़ावा देने, टैक्स सुधार और जन्म-मृत्यु पंजीकरण जैसे विधेयकों को पारित कराने पर था। लेकिन विपक्ष ने तय कर लिया था कि देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य और उन पर हुई बर्बरता के मुद्दे पर सरकार को कोई ढील नहीं दी जाएगी।
लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में विपक्ष ने भारी हंगामा किया, जिसके कारण कार्यवाही को बार-बार स्थगित करना पड़ा। विपक्ष की साफ मांग थी कि जब तक छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले इस गंभीर मुद्दे पर पूरी चर्चा नहीं होती, तब तक सदन का कोई अन्य विधायी कार्य आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।
3. राजनेताओं के तीखे प्रहार: सड़क से सदन और पीएम आवास तक किसने क्या कहा?
इस छात्र आंदोलन के समर्थन में देश के तमाम बड़े विपक्षी नेता सड़क से लेकर संसद तक उतर आए हैं। इन नेताओं ने पुलिसिया कार्रवाई को क्रूर और तानाशाही बताते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तुरंत इस्तीफे की मांग की है। नीचे विभिन्न नेताओं के बयानों को हुबहू (As it is) दर्ज किया गया है:
1. प्रियंका गांधी वाद्रा (सांसद, कांग्रेस)
"हमारी मौजूदा शिक्षा नीति में कई गंभीर कमियां और समस्याएं हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन पर संसद के भीतर तुरंत एक औपचारिक और विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। लेकिन सरकार का रवैया देखिए, वह छात्रों के साथ किसी भी प्रकार का संवाद (Dialogue) करने से साफ इनकार कर रही है। संवाद करने के बजाय, वे हमारे देश के युवाओं पर आंसू गैस के गोले छोड़ रहे हैं और लाठियां चलवा रहे हैं। प्रशासन और सरकार को यह मानवीय पक्ष नहीं भूलना चाहिए कि ये प्रदर्शनकारी कोई बाहरी तत्व या दुश्मन नहीं हैं, ये हमारे अपने बच्चे हैं।"
2. डिंपल यादव (नेता, समाजवादी पार्टी)
"दिल्ली की सड़कों पर छात्रों के साथ जो हुआ, वह हमारे लोकतंत्र और इतिहास के लिए एक 'काला दिवस' है। पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। उन्हें डंडों से बेरहमी से पीटा गया और करंट तक लगाया गया। हद तो तब हो गई जब वहां मौजूद महिला छात्रों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए। क्या यही 'नए भारत' की शर्मनाक स्थिति है? हमारी यह स्पष्ट मांग है कि शिक्षा व्यवस्था की इस बदहाली को देखते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उनके पद से तुरंत हटाया जाए। हम इस मुद्दे को पार्लियामेंट में पूरी मजबूती से उठाएंगे और दोबारा जंतर-मंतर पर अपना विरोध दर्ज कराएंगे।"
3. अखिलेश यादव और मनोज झा (सांसद व विपक्षी नेता)
"यह मौजूदा शासन पूरी तरह से एक 'चार्जशीटेड सरकार' बन चुका है। देश में फैली भयानक बेरोजगारी और परीक्षाओं में व्याप्त संस्थागत भ्रष्टाचार के प्रति यह सरकार पूरी तरह से उदासीन और संवेदनहीन हो चुकी है। जब देश का युवा अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहा है, तो पुलिस प्रशासन और भारी बैरिकेडिंग के दम पर उनकी आवाज़ को दबाया जा रहा है, जो कि पूरी तरह से निंदनीय है।"
4. राहुल गांधी (लोकसभा नेता, कांग्रेस)]
"यह लड़ाई देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य की रक्षा की लड़ाई है। लगातार हो रहे पेपर लीक ने युवाओं के सालों की मेहनत और उनके माता-पिता के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। इसके लिए सिर्फ शिक्षा मंत्री का इस्तीफा काफी नहीं है; छात्रों के भविष्य के साथ हुए इस खिलवाड़ के लिए खुद प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को भी पूरी राजनीतिक व नैतिक जवाबदेही लेनी चाहिए और अपने पदों से इस्तीफा देना चाहिए। हम छात्रों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और पीछे नहीं हटेंगे।"
5. रणदीप सिंह सुरजेवाला (सांसद, कांग्रेस)]
"2026 के इन परीक्षा घोटालों ने लाखों छात्रों के भविष्य को पूरी तरह तबाह कर दिया है, लेकिन सत्ता के नशे में चूर लोग इन छात्रों की चीखें सुनने को तैयार नहीं हैं। इसके अलावा, सरकार के संरक्षण में चल रहे भ्रष्टाचार का एक और बड़ा चेहरा सामने आया है। मैं राम मंदिर निर्माण और दान में हुई वित्तीय अनियमितताओं को लेकर 5 सीधे आरोप लगा रहा हूँ—पहला, जमीन अधिग्रहण में भारी विसंगतियां; दूसरा, दान में मिले सोने-चांदी के आभूषणों का कथित गबन; तीसरा, मंदिर के चढ़ावे की सीधी चोरी; चौथा, निर्माण कार्यों के ठेकों (Contracts) में 40% कमीशन का खेल; और पांचवां, राम मंदिर ट्रस्ट द्वारा फंड का भारी कुप्रबंधन। सरकार रसूखदार लोगों को बचाना बंद करे और पहले इन मुद्दों पर संसद में जवाब दे।"
4. संसद के भीतर रातभर भारी बारिश में ऐतिहासिक धरना: चंद्रशेखर आज़ाद
जहाँ एक तरफ दिल्ली की सड़कों पर आम छात्र पुलिस की मार खा रहे थे, वहीं संसद परिसर के भीतर एक बेहद ऐतिहासिक और भावुक कर देने वाला दृश्य देखा गया। आज़ाद समाज पार्टी के फायरब्रांड सांसद चंद्रशेखर आज़ाद जंतर-मंतर पर लाठियां खाने वाले और पिछले लगभग एक महीने से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के समर्थन में संसद के भीतर ही डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा के पैरों में अकेले धरने पर बैठ गए।
20 जुलाई की रात 11:00 बजे से शुरू हुआ उनका यह धरना पूरी रात जारी रहा। रातभर दिल्ली में भारी बारिश होती रही, लेकिन खुले आसमान के नीचे चंद्रशेखर आज़ाद बिना डिगे अपनी जगह पर डटे रहे। उन्होंने मीडिया से कहा कि जो छात्र एक महीने से भूखे बैठे हैं और जिन पर लाठियां चली हैं, उनके साथ हुई इस क्रूरता और अन्याय के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता ही उन्हें इस बारिश में वहां बनाए हुए है। जब तक शिक्षा प्रणाली में सुधार और छात्रों के साथ संवाद शुरू नहीं होता, उनका यह संघर्ष जारी रहेगा।
5. पीएम आवास की तरफ मार्च और मल्लिकार्जुन खड़गे के चेंबर की अंदरूनी रणनीति
आंदोलन की तीव्रता को बढ़ाते हुए कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और पार्टी के कई सांसदों ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया। ये सभी नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के निवास (10 राजाजी मार्ग) पर इकट्ठा हुए और वहां से पैदल मार्च करते हुए सीधे प्रधानमंत्री आवास (7 लोक कल्याण मार्ग) की तरफ बढ़ गए और वहां पहुंच कर धरने पर बैठ गए। इस हाई-प्रोफाइल मार्च ने दिल्ली पुलिस के हाथ-पैर फुला दिए। संसद सत्र की शुरुआत के ठीक पहले इस बड़े घेराव से कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे इस मुद्दे पर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
हालाँकि, वरिष्ठ पत्रकार सौरभ द्विवेदी की एक खोजी चर्चा के अनुसार, इस आंदोलन को लेकर विपक्षी गठबंधन के भीतर भी एक दिलचस्प राजनीतिक खींचतान चल रही है:
अंदरूनी खींचतान: हर सुबह 10:00 बजे मल्लिकार्जुन खड़गे के चेंबर में विपक्षी दलों के फ्लोर लीडर्स की बैठक होती है। 21 जुलाई की बैठक में कांग्रेस शुरू में CJP प्रोटेस्ट के बजाय 'राम मंदिर चंदा चोरी' के मुद्दे को मुख्य प्राथमिकता बनाना चाहती थी।
क्षेत्रीय दलों का दबाव: लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी (धर्मेंद्र यादव) और अन्य क्षेत्रीय दलों ने कड़ा रुख अपनाते हुए तर्क दिया कि इस समय देश में CJP का छात्र आंदोलन और संसद मार्ग का बवाल सबसे बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है, इसलिए इसे छोड़ना आत्मघाती होगा। अंततः कांग्रेस को झुकना पड़ा और दोनों मुद्दों को उठाने पर सहमति बनी।
कांग्रेस की झिझक का कारण: सौरव द्विवेदी की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस के भीतर एक गुप्त राजनीतिक डर भी है। उन्हें डर है कि कहीं सोनम वांगचुक और CJP का यह नया छात्र आंदोलन भविष्य में 'आम आदमी पार्टी' (AAP) की तरह एक बड़ी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनकर न उभर जाए और विपक्ष की पारंपरिक सियासी जमीन (Political Space) पर कब्जा न कर ले। यही कारण है कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा शुरुआत में सोनम वांगचुक को दिए गए समर्थन के बाद, अब कांग्रेस एक बहुत ही संतुलित (Balanced) रुख अपना रही है—वे पूरी तरह से आंदोलन के नियंत्रण में भी नहीं हैं और इसके विरोध में भी नहीं हैं।
इस बीच सियासी सरगर्मी और बढ़ने वाली है क्योंकि जंतर-मंतर पर छात्रों के डटे रहने के बीच यह खबर आ रही है कि शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे भी जल्द ही छात्रों को अपना सीधा समर्थन देने के लिए मुंबई से दिल्ली पहुंच सकते हैं।
6. कोर्ट रूम का ड्रामा: सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
इस पूरे महाआंदोलन की मुख्य धुरी लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक हैं, जो 28 जून से जंतर-मंतर पर लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने उनके गिरते स्वास्थ्य का हवाला देकर उन्हें जबरन वहां से उठाया और सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया था। सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने इस पुलिसिया कार्रवाई को पूरी तरह गैरकानूनी और बुनियादी अधिकारों का हनन बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी।
21 जुलाई को इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ (चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया) के सामने बेहद तीखी बहस हुई। वांगचुक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने उनका पक्ष रखा, जबकि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कोर्ट में पेश हुए।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया:
सोनम वांगचुक को तुरंत सफदरजंग अस्पताल से हटाकर मेदांता अस्पताल में शिफ्ट किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शिफ्टिंग का यह निर्णय वांगचुक की व्यक्तिगत पसंद के बजाय पूरी तरह से डॉक्टरों की मेडिकल सलाह और उनकी सुरक्षा पर आधारित होगा।
सफदरजंग अस्पताल की सभी मेडिकल रिपोर्ट्स और क्लिनिकल ऑब्जरवेशंस मेदांता अस्पताल के डॉक्टरों को सौंपे जाएं ताकि उनकी कड़ी मेडिकल मॉनिटरिंग और इलाज सुचारू रूप से जारी रह सके।
7. 'नाक की लड़ाई' और आधी रात को गुरुद्वारे का मानवीय सहारा
इस आंदोलन का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पहलू जमीन पर लड़ रहे युवाओं का अटूट हौसला है। 20 जुलाई की दोपहर को पुलिस ने जंतर-मंतर से छात्रों के टेंट उखाड़ दिए थे, उनका मंच तोड़ दिया था और लाठियां मारकर उन्हें खदेड़ दिया था। लेकिन इन छात्रों का जज्बा नहीं टूटा। जिन घायल और थके हुए छात्रों के पास रात में रुकने की कोई जगह नहीं थी, उन्हें बंगला साहिब गुरुद्वारा ने सहारा दिया। गुरुद्वारे में छात्रों के लिए लंगर और रात गुजारने की ठहरने की व्यवस्था की गई।
और इस आंदोलन की ताकत देखिए—21 जुलाई की देर रात 2:30 बजे, वही घायल और चोटिल छात्र भारी संख्या में दोबारा जंतर-मंतर की उसी मूल जगह पर आकर इकट्ठा हो गए और धरने पर बैठ गए। प्रदर्शन में शामिल माता-पिता अपने बच्चों के अंधकार में लटके भविष्य को लेकर रोते हुए कैमरे पर नजर आए, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि उनके बच्चे शहीद भगत सिंह के विचारों से प्रेरित हैं और वे लाठियों से डरकर घर बैठने वाले नहीं हैं।
वर्तमान गतिरोध (The Deadlock)
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला अब सरकार और छात्रों के बीच एक 'नाक की लड़ाई' (Matter of Pride) बन चुका है। रिपोर्ट बताती है कि सरकार छात्रों के गुस्से को शांत करने के लिए परीक्षा प्रणाली में सुधार का नया कानून लाने या प्रभावित छात्रों को मुआवजा देने जैसे अन्य विकल्पों पर तो विचार करने को तैयार है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के मुद्दे पर पूरी तरह अड़ गई है। दूसरी तरफ, आंदोलनकारी छात्र बिना इस्तीफे और जवाबदेही तय हुए एक इंच भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
Conclusion
एक ऐसे देश में जहाँ करोड़ों मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों के युवा अपने जीवन के सबसे सुनहरे 4 से 5 साल सिर्फ एक अदद सरकारी नौकरी या प्रतियोगी परीक्षा (Competitive Exam) की तैयारी में, एक छोटे से कमरे में घुट-घुट कर बिता देते हैं, वहाँ बार-बार पेपर लीक होना सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय अपराध है। लोकतंत्र में लाठियों के जोर पर, आंसू गैस के धुएं में या बैरिकेड्स में करंट छोड़कर देश के भविष्य (युवाओं) की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। सरकार को अपनी राजनीतिक जिद छोड़कर तुरंत इन छात्रों से सीधा और पारदर्शी संवाद स्थापित करना चाहिए।
आपकी इस पूरे महाआंदोलन पर क्या राय है? क्या केंद्रीय शिक्षा मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए? क्या पुलिस द्वारा छात्रों पर किया गया यह बल प्रयोग किसी भी तरह से जायज ठहराया जा सकता है? नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपने विचार पूरी बेबाकी से साझा करें और इस विस्तृत खोजी रिपोर्ट को देश के हर एक छात्र, अभिभावक और व्हाट्सएप ग्रुप तक पहुँचाने के लिए तुरंत शेयर करें!
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